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<title> طنزهای ارمغان زمان فشمی</title>
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<description>هرچه از دوست می رسد برگ سبزی است ارمغان درویش!</description>
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<lastBuildDate>Mon, 30 Jun 2008 15:53:18 GMT</lastBuildDate>
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<title>شکرخند از شیر گرفته شد!</title>
<link>http://armaghonline.blogfa.com/post-115.aspx</link>
<description>&lt;DIV class=posttext&gt;
&lt;P class=MsoNormal dir=rtl style=&quot;MARGIN: 0in 0in 0pt&quot;&gt;&lt;B&gt;&lt;SPAN lang=FA&gt;&lt;?xml:namespace prefix = o ns = &quot;urn:schemas-microsoft-com:office:office&quot; /&gt;&lt;o:p&gt;&lt;FONT face=&quot;Verdana, Arial, Helvetica, sans-serif&quot; color=#993300 size=3&gt; &lt;BR&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;&lt;FONT face=&quot;Verdana, Arial, Helvetica, sans-serif&quot;&gt;&lt;FONT size=3&gt;&lt;FONT color=#993300&gt;&lt;B&gt;&lt;SPAN lang=FA&gt;طي دو سال گذشته، استقبال مردم از «شكرخند»، چنان رشد صعودي داشته كه در جلسة اين ماه (تير) كه با دومين سالگرد تولد آن نيز مقارن شد، در سالن جاي سوزن انداختن هم باقي نمانده بود و بعد از پرشدن صندلي‌ها و پله‌ها و تمام منافذ و سوراخ سمبه‌هاي ديگر (!)، به ناچار، گروهي از حضار به سن رحم نكرده و آنجا را نيز به اشغال خود درآوردند، چون تنها جايي بود كه به نظر مي‌رسيد قسر در رفته است!&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;/B&gt; &lt;BR&gt;&lt;BR&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;FONT face=&quot;Verdana, Arial, Helvetica, sans-serif&quot;&gt;&lt;FONT size=3&gt;&lt;FONT color=#993300&gt;&lt;B&gt;&lt;SPAN lang=FA&gt; سالن به قدري شلوغ بود كه براي به دست آوردن جايي براي نشستن هم كه شده، داریوش کاردان و شهرام شکیبا هم در کنار رضا رفیع و امیرحسین مدرس، پشت ميز مجري‌گري قرار گرفتند و از آنجا كه هر كدام براي خودشان يك پا استاد طنز و تكه پراني هستند، كلي به رونق جلسه افزوده، و در واقع آن را چهار برابر کردند!&lt;BR&gt;&lt;BR&gt;   &lt;IMG style=&quot;WIDTH: 367px; HEIGHT: 221px&quot; height=2317 alt=&quot;چهار در یک!&quot; hspace=0 src=&quot;http://irapic.com/uploads/1215195496.jpg&quot; width=3096 align=baseline border=0&gt;&lt;BR&gt;&lt;BR&gt;رضا رفیع سخنانش را این طور شروع کرد:&quot; امروز اساتید بسیاری در جلسه حضور دارند... البته لابد مستحضرید که کلمه&quot;اساتید&quot; غلط است و غلط زیادی هم هست(!) پس ناچارا... ناچارا هم که غلط است... به هرحال می خواستم بگویم در میان جمعیت چشممان مدام به استادان گرام می افتد... گرامی البته!!&quot;&lt;BR&gt;&lt;BR&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;/B&gt;&lt;B&gt;&lt;SPAN lang=FA&gt;«حامد عسكري» اولين كسي بود كه شعر خواند و از رباعيات طنزآميزش تابلو شد كه دانشجوست:&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;/B&gt; &lt;/FONT&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/FONT&gt;
&lt;P class=MsoNormal dir=rtl style=&quot;MARGIN: 0in 0in 0pt&quot;&gt;&lt;B&gt;&lt;SPAN lang=FA&gt;&lt;FONT face=&quot;Verdana, Arial, Helvetica, sans-serif&quot;&gt;&lt;FONT size=3&gt;&lt;FONT color=#990099&gt;لبخند بزن دو چشم باراني را&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P class=MsoNormal dir=rtl style=&quot;MARGIN: 0in 0in 0pt&quot;&gt;&lt;B&gt;&lt;SPAN lang=FA&gt;&lt;FONT face=&quot;Verdana, Arial, Helvetica, sans-serif&quot;&gt;&lt;FONT size=3&gt;&lt;FONT color=#990099&gt;تجويز كني نگاه درماني را&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P class=MsoNormal dir=rtl style=&quot;MARGIN: 0in 0in 0pt&quot;&gt;&lt;B&gt;&lt;SPAN lang=FA&gt;&lt;FONT face=&quot;Verdana, Arial, Helvetica, sans-serif&quot;&gt;&lt;FONT size=3&gt;&lt;FONT color=#990099&gt;يك شعله بخند تا به آتش بكشي&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P class=MsoNormal dir=rtl style=&quot;MARGIN: 0in 0in 0pt&quot;&gt;&lt;B&gt;&lt;SPAN lang=FA&gt;&lt;FONT face=&quot;Verdana, Arial, Helvetica, sans-serif&quot;&gt;&lt;FONT size=3&gt;&lt;FONT color=#990099&gt;دانشكده علوم انساني را!&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P class=MsoNormal dir=rtl style=&quot;MARGIN: 0in 0in 0pt&quot;&gt;&lt;B&gt;&lt;SPAN lang=FA&gt;&lt;FONT face=&quot;Verdana, Arial, Helvetica, sans-serif&quot;&gt;&lt;FONT size=3&gt;&lt;FONT color=#993300&gt;***&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P class=MsoNormal dir=rtl style=&quot;MARGIN: 0in 0in 0pt&quot;&gt;&lt;B&gt;&lt;SPAN lang=FA&gt;&lt;FONT face=&quot;Verdana, Arial, Helvetica, sans-serif&quot;&gt;&lt;FONT size=3&gt;&lt;FONT color=#990099&gt;تو ماه زلالي و كمان ابرويي&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P class=MsoNormal dir=rtl style=&quot;MARGIN: 0in 0in 0pt&quot;&gt;&lt;B&gt;&lt;SPAN lang=FA&gt;&lt;FONT face=&quot;Verdana, Arial, Helvetica, sans-serif&quot;&gt;&lt;FONT size=3&gt;&lt;FONT color=#990099&gt;من اِندِ مرامم و صداقت‌گويي&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P class=MsoNormal dir=rtl style=&quot;MARGIN: 0in 0in 0pt&quot;&gt;&lt;B&gt;&lt;SPAN lang=FA&gt;&lt;FONT face=&quot;Verdana, Arial, Helvetica, sans-serif&quot;&gt;&lt;FONT size=3&gt;&lt;FONT color=#990099&gt;مشكل حل است، عصر يكسر برويم&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P class=MsoNormal dir=rtl style=&quot;MARGIN: 0in 0in 0pt&quot;&gt;&lt;B&gt;&lt;SPAN lang=FA&gt;&lt;FONT face=&quot;Verdana, Arial, Helvetica, sans-serif&quot; color=#993300 size=3&gt;&lt;FONT color=#990099&gt;تا دفتر ازدواج دانشجويي!&lt;BR&gt;&lt;/FONT&gt;***&lt;BR&gt;&lt;FONT color=#990099&gt;از جزوه این و آن کپی می گیرم&lt;BR&gt;تا با توام از زمان کپی می گیرم&lt;BR&gt;رد دو لبت به روی فنجان، یعنی&lt;BR&gt;از خنده نازتان کپی می گیرم!&lt;BR&gt;&lt;/FONT&gt;***&lt;BR&gt;&lt;FONT color=#990099&gt;یک شب به دلم ستاره ات می افتد&lt;BR&gt;چشمان پر از شراره ات می افتد&lt;BR&gt;هی با تلفوون(!) خونه تون زنگ نزن&lt;BR&gt;ای دختر بد! شماره ات می افتد!&lt;BR&gt;&lt;/FONT&gt;***&lt;BR&gt;&lt;FONT color=#990099&gt;دیروز تمام آرزوهایم سوخت&lt;BR&gt;چایی خوردم، ته ته نایم سوخت&lt;BR&gt;مردی آمد پی اش، سمندی بژ داشت&lt;BR&gt;... خب، حدس زدی که تا کجاهایم سوخت!!&lt;BR&gt;&lt;/FONT&gt;*** &lt;BR&gt;&lt;FONT color=#990099&gt;تو دستات تیشه هم باشه قشنگه&lt;BR&gt;رقیب ریشه هم باشه قشنگه&lt;BR&gt;تو عینک می زنی، عیبی نداره&lt;BR&gt;عسل تو شیشه هم باشه قشنگه!&lt;BR&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P class=MsoNormal dir=rtl style=&quot;MARGIN: 0in 0in 0pt&quot;&gt;&lt;B&gt;&lt;SPAN lang=FA&gt;&lt;FONT face=&quot;Verdana, Arial, Helvetica, sans-serif&quot; color=#993300 size=3&gt;رضا رفیع ضمن ابراز خوشحالی از پیوستن این دانشجو به جنبش شکرخند، تاکید کرد:&quot; جنبش دانشجویی که لزوما نباید سیاسی باشد!&quot; &lt;/FONT&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P class=MsoNormal dir=rtl style=&quot;MARGIN: 0in 0in 0pt&quot;&gt;&lt;FONT face=&quot;Verdana, Arial, Helvetica, sans-serif&quot; color=#993300 size=3&gt; &lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P class=MsoNormal dir=rtl style=&quot;MARGIN: 0in 0in 0pt&quot;&gt;&lt;B&gt;&lt;SPAN lang=FA&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;/B&gt;&lt;FONT face=&quot;Verdana, Arial, Helvetica, sans-serif&quot; color=#993300 size=3&gt; &lt;/FONT&gt;&lt;B&gt;&lt;SPAN lang=FA&gt;&lt;FONT face=&quot;Verdana, Arial, Helvetica, sans-serif&quot; color=#993300 size=3&gt; با پرشدن سالن، از شاعرها و دست‌اندركاران جلسه كه خودماني‌ترند، خواسته شد بروند روي سن بنشينند. تعدادي از آقايان طناز (!) اين دعوت را اجابت كردند. به تبع آنها من هم «پا به سن گذاشتم» (به قول آقاي رفيع، همه روزي پا به سن مي‌گذارند و اين كار خجالت ندارد!). البته با آن كه صندلي‌ام را به دوستي بخشيده بودم، روي پله‌ها جايي براي خودم داشتم اما به عنوان پرچمدار خانمها بر خود لازم دانستم كه اين كار را انجام بدهم، هر چند مي‌دانستم بعضي از آقايان، همدوشي خانمها را در كنار خود برنمي‌تابند، چنان كه يكيشان هم گفت: «اينجا مردانه است ها!»  ( پس خود او آنجا چه کار می کرد؟!)اما اين حركت من باعث شد تا جمعي از خانمها كه از ايستادن و فشار جمعيت به ستوه آمده بودند نيز به ما بپيوندند و روي آن آقا را به رنگ پيراهن زردش درآورده و كم كنند!&lt;BR&gt;در بخشی از برنامه، تعدادی ازآقایان به پرده نمایش فیلم تکیه دادند و رضا رفیع مجبور شد به آنها تذکر بدهد:&quot; لطفا به پرده تکیه ندهید و بی پرده بنشینید!&quot;&lt;BR&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;/B&gt;&lt;B&gt;&lt;SPAN lang=FA&gt;&lt;FONT face=&quot;Verdana, Arial, Helvetica, sans-serif&quot;&gt;&lt;FONT size=3&gt;&lt;FONT color=#993300&gt;بدين سان بود كه براي اولين بار، از روي سن به فيلمهايي كه روي پرده پخش مي‌شد نگاه كرديم و خاك صحنه خورديم!&lt;BR&gt;&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P class=MsoNormal dir=rtl style=&quot;MARGIN: 0in 0in 0pt&quot;&gt;&lt;B&gt;&lt;SPAN lang=FA&gt;&lt;FONT face=&quot;Verdana, Arial, Helvetica, sans-serif&quot; color=#993300 size=3&gt;يكي از اين فيلمها، انيميشني خارجي بود كه رضا رفيع از «بهرام عظيمي» (سازنده تيزرهاي تلويزيوني كه «سيا ساكتي» او را حتماً مي‌شناسيد) براي پخش گرفته بود. در اين انيميشن، دو نفر ساز مي‌زدند اما به دليل نقص فني يا شايد هم نوع كار، صدايي از سازها شنيده نمي‌شد. «رضا رفيع»، گفت:&lt;/FONT&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;/B&gt;&lt;B&gt;&lt;SPAN lang=FA&gt;&lt;FONT face=&quot;Verdana, Arial, Helvetica, sans-serif&quot;&gt;&lt;FONT size=3&gt;&lt;FONT color=#993300&gt;«همه جا صداي ساز مي‌آيد، خودش را نشان نمي‌دهند، اينجا ساز را نشان مي‌دهند، صدايش درنمي‌آيد!»&lt;BR&gt;شخصیت کارتونی برای درآوردن صدای ساز، طوری به خودش فشار می آورد که رضا رفیع گفت:&quot; این جور که او می زند، صدا از جای دیگری بلند می شود!&quot;&lt;BR&gt;&lt;BR&gt;&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P class=MsoNormal dir=rtl style=&quot;MARGIN: 0in 0in 0pt&quot;&gt;&lt;B&gt;&lt;SPAN lang=FA&gt;&lt;FONT face=&quot;Verdana, Arial, Helvetica, sans-serif&quot;&gt;&lt;FONT size=3&gt;&lt;FONT color=#993300&gt;فيلم ديگر، كاري از «بزرگمهر حسين‌پور» بود كه كنسرتي از شهرام ناظري را به شكل كارتوني تصوير كرده بود.&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P class=MsoNormal dir=rtl style=&quot;MARGIN: 0in 0in 0pt&quot;&gt;&lt;B&gt;&lt;SPAN lang=FA&gt;&lt;FONT face=&quot;Verdana, Arial, Helvetica, sans-serif&quot;&gt;&lt;FONT size=3&gt;&lt;FONT color=#993300&gt;«داريوش كاردان» هر بار مثل يك ناظم، به كساني كه روي سن نشسته بودند دستور مي‌داد: «به سمت پرده... حالا برگرديد سمت سالن!»&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P class=MsoNormal dir=rtl style=&quot;MARGIN: 0in 0in 0pt&quot;&gt;&lt;B&gt;&lt;SPAN lang=FA&gt;&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;/B&gt;&lt;FONT face=&quot;Verdana, Arial, Helvetica, sans-serif&quot; color=#993300 size=3&gt; &lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P class=MsoNormal dir=rtl style=&quot;MARGIN: 0in 0in 0pt&quot;&gt;&lt;B&gt;&lt;SPAN lang=FA&gt;&lt;FONT face=&quot;Verdana, Arial, Helvetica, sans-serif&quot;&gt;&lt;FONT size=3&gt;&lt;FONT color=#993300&gt;در قسمتي از برنامه، از «ابوالفضل زرويي نصرآباد» به عنوان «بنيانگذار شب‌هاي شعر طنز در ايران» كه با جلسه «در حلقه رندان» شروع شد، دعوت به عمل آمد تا براي حضار شعر بخواند. تا او برود پشت تريبون، مجري‌ها به قدري از شيوه سهل و ممتنع او در سرودن شعر تعريف كردند كه اولين حرف آقای زرویی اين بود: «اگر به تعريف‌هايتان ادامه بدهيد من آب مي‌شوم!» رضا رفیع جواب داد: «اتفاقاً (سالن گرم است و) آب كم داريم!» مهندس كاوه كه پیش ما روي سن نشسته بود، پراند: «آب كم جو، تشنگي‌آور به دست!»&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P class=MsoNormal dir=rtl style=&quot;MARGIN: 0in 0in 0pt&quot;&gt;&lt;B&gt;&lt;SPAN lang=FA&gt;&lt;FONT face=&quot;Verdana, Arial, Helvetica, sans-serif&quot; color=#993300 size=3&gt;ابوالفضل زرويي، شعرهايي از كتاب «اصل مطلب» خود را برای حضار خواند.&lt;/FONT&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P class=MsoNormal dir=rtl style=&quot;MARGIN: 0in 0in 0pt&quot;&gt;&lt;B&gt;&lt;SPAN lang=FA&gt;&lt;FONT face=&quot;Verdana, Arial, Helvetica, sans-serif&quot;&gt;&lt;FONT size=3&gt;&lt;FONT color=#993300&gt;در اين لحظه خانمي كه كنار من نشسته بود، يواشكي از من پرسيد: «اسم شاعر «محكمه الهي»، «جليل جوادي» بود يا «جواد جليلي؟!»&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P class=MsoNormal dir=rtl style=&quot;MARGIN: 0in 0in 0pt&quot;&gt;&lt;B&gt;&lt;SPAN lang=FA&gt;&lt;FONT face=&quot;Verdana, Arial, Helvetica, sans-serif&quot; color=#993300 size=3&gt;ـ هيچ كدام؛ خليل جوادي!&lt;BR&gt;&lt;BR&gt;&quot;همایون حسینیان&quot; پیش از شعرخوانی، ضمن ابراز نگرانی از گیر دادن گشت های ارشاد به &quot;مدل موهای مشکوک&quot; و اشاره به سر خودش، گفت:&quot; اگر به من بگویند موهایت کو چه بگویم؟!&quot;&lt;BR&gt;سپس خواند:&lt;BR&gt;&lt;FONT color=#990099&gt;مبادا یک زمان لوست ببینم&lt;BR&gt;و عشوه توی قاموست ببینم&lt;BR&gt;دعا کردم اگر با ما نسازی&lt;BR&gt;دس مردم، بلوتوثت ببینم!&lt;/FONT&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P class=MsoNormal dir=rtl style=&quot;MARGIN: 0in 0in 0pt&quot;&gt;&lt;B&gt;&lt;SPAN lang=FA&gt;&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;/B&gt;&lt;FONT face=&quot;Verdana, Arial, Helvetica, sans-serif&quot; color=#993300 size=3&gt; &lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P class=MsoNormal dir=rtl style=&quot;MARGIN: 0in 0in 0pt&quot;&gt;&lt;B&gt;&lt;SPAN lang=FA&gt;&lt;FONT face=&quot;Verdana, Arial, Helvetica, sans-serif&quot; color=#993300 size=3&gt;مدتي پس از شروع برنامه، «رضا صادقي»، خواننده محبوب نسل جوان و همراهانش در ميان تشويق شديد حضار وارد سالن شده و در رديف اول صندلي‌ها جا گرفتند. مهماناني مثل دكتر بوترابي (رئيس پرشين بلاگ) و خانم پولادزاده (مسؤول روابط عمومي پرشين‌بلاگ) و تعدادي از شعراي طنزپرداز، با خالي كردن اين رديف و نشستن روي زمين، به خواننده محبوب مشكي‌پوش، خوشامد گفتند.&lt;BR&gt;&lt;BR&gt;   &lt;IMG style=&quot;WIDTH: 344px; HEIGHT: 209px&quot; height=2307 alt=&quot;رضا صادقی در حال ایراد بیانات صادقانه!&quot; hspace=0 src=&quot;http://irapic.com/uploads/1215135817.jpg&quot; width=2536 align=baseline border=0&gt;&lt;BR&gt;  &lt;BR&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;/B&gt;&lt;B&gt;&lt;SPAN lang=FA&gt;&lt;FONT face=&quot;Verdana, Arial, Helvetica, sans-serif&quot; color=#993300 size=3&gt;پخش ترانه «وايسا دنيا»، در حالي كه خواننده اش در سالن حضور داشت، همه را به وجد آورد. رضا صادقي، به وسيله ميكروفن سياري كه به او سپرده شد، چند جمله‌اي هم با مردم حرف زد و گفت كه او نيز از طريق شنيدن شعر&quot;محکمه الهی&quot;از&quot;خلیل جوادی&quot; با شكرخند آشنا شده و خوشحال است كه حالا اينجاست.&lt;BR&gt;رضا رفیع ضمن اشاره به ترانه&quot; وایسا دنیا من می خوام پیاده شم&quot;، گفت:&quot;البته خیلی ها می گویند وایسا دنیا، می خواهیم پیاده ات کنیم!&quot;&lt;/FONT&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P class=MsoNormal dir=rtl style=&quot;MARGIN: 0in 0in 0pt&quot;&gt;&lt;B&gt;&lt;SPAN lang=FA&gt;&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;/B&gt;&lt;FONT face=&quot;Verdana, Arial, Helvetica, sans-serif&quot; color=#993300 size=3&gt; &lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P class=MsoNormal dir=rtl style=&quot;MARGIN: 0in 0in 0pt&quot;&gt;&lt;B&gt;&lt;SPAN lang=FA&gt;&lt;FONT face=&quot;Verdana, Arial, Helvetica, sans-serif&quot;&gt;&lt;FONT size=3&gt;&lt;FONT color=#993300&gt;هنگام پخش ترانه رضا صادقي و بعد ازآن، موقع اجراي ترانه ديگري كه «امير حسين مدرس» آن را خوانده و « فربد شكرايي» اجرا مي‌كرد، مردم كف مي‌زدند و شادي مي‌كردند.&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P class=MsoNormal dir=rtl style=&quot;MARGIN: 0in 0in 0pt&quot;&gt;&lt;B&gt;&lt;SPAN lang=FA&gt;&lt;FONT face=&quot;Verdana, Arial, Helvetica, sans-serif&quot;&gt;&lt;FONT size=3&gt;&lt;FONT color=#993300&gt;«همايون حسينيان»، شاعر طنزپرداز، را ديدم كه ميان جمعيت روي سن نشسته و مي‌گويد: «شاباش، شاباش!» &lt;BR&gt;در اینجا رضا رفیع به حضار تذکر داد:&quot; عالم، عالم ناسوت است... اما از عزیزان خواهشمندیم سوت هایشان را کنترل کنند!&quot; &lt;BR&gt;&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P class=MsoNormal dir=rtl style=&quot;MARGIN: 0in 0in 0pt&quot;&gt;&lt;B&gt;&lt;SPAN lang=FA&gt;&lt;BR&gt;&lt;FONT face=&quot;Verdana, Arial, Helvetica, sans-serif&quot; color=#993300 size=3&gt;وقتي داريوش كاردان براي لحظاتي رفت و برگشت، در جواب سؤال رضا رفيع كه پرسيد: «كجا رفته بودي؟» گفت: «رفته بودم سقاخونه دعا كنم!» و پاسخ شنيد: «دروغ نگو، دروغ نگو!» &lt;BR&gt;&lt;BR&gt;کاردان، دوبیتی معروفش را در مورد شهرام شکیبا دوباره خوانی کرد که این طور تمام می شود:&lt;BR&gt;&lt;FONT color=#990099&gt;خداوندا مگر موجود قحط است&lt;BR&gt;که شهرام شکیبا آفریدند؟!&lt;BR&gt;&lt;/FONT&gt;و افزود: مدت هاست من این شعر را سروده ام و هنوز شهرام جوابی به آن نداده است.&lt;BR&gt;شهرام شکیبا گفت:&quot;من آن کاری که عارف با ایرج کرد و باعث معروفیت او شد نمی کنم!&quot; کاردان بلافاصله جواب داد:&quot; ولی من می کنم!&quot;&lt;BR&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P class=MsoNormal dir=rtl style=&quot;MARGIN: 0in 0in 0pt&quot;&gt;&lt;B&gt;&lt;SPAN lang=FA&gt;&lt;FONT face=&quot;Verdana, Arial, Helvetica, sans-serif&quot;&gt;&lt;FONT size=3&gt;&lt;FONT color=#993300&gt;«محسن اشتياقي»  پیش از شعر خواندن گفت:&quot; با این جمعیتی که در سالن هست، آدم شامورتی بازی هم بکند، فکر نمی کنم بگیرد.&quot; داریوش کاردان جواب داد:&quot; اتفاقا با این جمعیت، هرچه بخوانی، خوانده ای!&quot;&lt;BR&gt;او هم درباره دومين سالگرد تولد شكرخند خواند:&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P class=MsoNormal dir=rtl style=&quot;MARGIN: 0in 0in 0pt&quot;&gt;&lt;B&gt;&lt;SPAN lang=FA&gt;&lt;FONT face=&quot;Verdana, Arial, Helvetica, sans-serif&quot;&gt;&lt;FONT size=3&gt;&lt;FONT color=#990099&gt;الحق كه شكر خند مكاني است شلوغ&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P class=MsoNormal dir=rtl style=&quot;MARGIN: 0in 0in 0pt&quot;&gt;&lt;B&gt;&lt;SPAN lang=FA&gt;&lt;FONT face=&quot;Verdana, Arial, Helvetica, sans-serif&quot;&gt;&lt;FONT size=3&gt;&lt;FONT color=#990099&gt;چون شير عسل برخي و برخي چون دوغ&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P class=MsoNormal dir=rtl style=&quot;MARGIN: 0in 0in 0pt&quot;&gt;&lt;B&gt;&lt;SPAN lang=FA&gt;&lt;FONT face=&quot;Verdana, Arial, Helvetica, sans-serif&quot;&gt;&lt;FONT size=3&gt;&lt;FONT color=#990099&gt;از غلظت شير و دوغشان فهميدم&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P class=MsoNormal dir=rtl style=&quot;MARGIN: 0in 0in 0pt&quot;&gt;&lt;B&gt;&lt;SPAN lang=FA&gt;&lt;FONT face=&quot;Verdana, Arial, Helvetica, sans-serif&quot;&gt;&lt;FONT size=3&gt;&lt;FONT color=#993300&gt;&lt;FONT color=#990099&gt;در سن دو سالگي رسيده به بلوغ!&lt;BR&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;BR&gt;&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P class=MsoNormal dir=rtl style=&quot;MARGIN: 0in 0in 0pt&quot;&gt;&lt;B&gt;&lt;SPAN lang=FA&gt;&lt;FONT face=&quot;Verdana, Arial, Helvetica, sans-serif&quot;&gt;&lt;FONT size=3&gt;&lt;FONT color=#993300&gt;يكي از شعرهايي كه خوانده شد، تضميني بود بر مصرع «چه كسي مي‌خواهد من و تو ما نشويم؟» از حميد مصدق. اين شعر «رضا رفيع» را به ياد خاطره‌اي انداخت: «در جريان انقلاب، برادرم ديده بود كه كسي، شعر حميد مصدق را قاطي كرده و به اشتباه فرياد مي‌زند: «من اگر برخيزم، تو اگر برخيزي، چه كسي بنشيند؟»! اخوي ما هم به او مي‌گويد: «تو يكي بنشين!» &lt;BR&gt;&lt;BR&gt;&quot;مهدی استاد احمد&quot; این بار هم شعرهای جالبی خواند:&lt;BR&gt;&lt;FONT color=#990099&gt;شدم از مردی و مردانگی سیر&lt;BR&gt;دارم شاکی می شم از دست تقدیر&lt;BR&gt;برای روز مادر، شمش و سکه&lt;BR&gt;واسه روز پدر، شو*رت و عرقگیر!&lt;BR&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;o:p&gt;یا:&lt;/o:p&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P class=MsoNormal dir=rtl style=&quot;MARGIN: 0in 0in 0pt&quot;&gt;&lt;B&gt;&lt;SPAN lang=FA&gt;&lt;FONT face=&quot;Verdana, Arial, Helvetica, sans-serif&quot;&gt;&lt;FONT size=3&gt;&lt;FONT color=#990099&gt;كفگير، گرين كارت، تريلي، ارزن&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P class=MsoNormal dir=rtl style=&quot;MARGIN: 0in 0in 0pt&quot;&gt;&lt;B&gt;&lt;SPAN lang=FA&gt;&lt;FONT face=&quot;Verdana, Arial, Helvetica, sans-serif&quot;&gt;&lt;FONT size=3&gt;&lt;FONT color=#990099&gt;سيم كارت، روماتيسم، ترافيك فرضاً&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P class=MsoNormal dir=rtl style=&quot;MARGIN: 0in 0in 0pt&quot;&gt;&lt;B&gt;&lt;SPAN lang=FA&gt;&lt;FONT face=&quot;Verdana, Arial, Helvetica, sans-serif&quot;&gt;&lt;FONT size=3&gt;&lt;FONT color=#990099&gt;در مورد هر مساله در دنيا هست&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P class=MsoNormal dir=rtl style=&quot;MARGIN: 0in 0in 0pt&quot;&gt;&lt;B&gt;&lt;SPAN lang=FA&gt;&lt;FONT face=&quot;Verdana, Arial, Helvetica, sans-serif&quot; color=#993300 size=3&gt;&lt;FONT color=#990099&gt;بايد نظرش را بدهد مادر زن!&lt;BR&gt;&lt;BR&gt;&lt;/FONT&gt;او تولد دوسالگی و از شیر گرفته شدن شکرخند را تبریک گفت و رضا رفیع ادامه داد:&quot; حالا کیک هم می آورند...رقص چاقو هم داریم!&quot;&lt;BR&gt;&lt;BR&gt;   &lt;IMG style=&quot;WIDTH: 353px; HEIGHT: 208px&quot; height=2057 alt=&quot;در میان علاقه مندان پا به سن گذاشته!&quot; hspace=0 src=&quot;http://irapic.com/uploads/1215165815.jpg&quot; width=2848 align=baseline border=0&gt;&lt;BR&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P class=MsoNormal dir=rtl style=&quot;MARGIN: 0in 0in 0pt&quot;&gt;&lt;B&gt;&lt;SPAN lang=FA&gt;&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;/B&gt;&lt;FONT face=&quot;Verdana, Arial, Helvetica, sans-serif&quot; color=#993300 size=3&gt; &lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P class=MsoNormal dir=rtl style=&quot;MARGIN: 0in 0in 0pt&quot;&gt;&lt;B&gt;&lt;SPAN lang=FA&gt;&lt;FONT face=&quot;Verdana, Arial, Helvetica, sans-serif&quot;&gt;&lt;FONT size=3&gt;&lt;FONT color=#993300&gt;میهمان این ماه شکرخند، خانم «مريم سعادت» بود و اميرحسين مدرس، زندگينامه ايشان را كه رضا رفيع مي‌نويسد، به سبك برنامه «طلوع ماه» براي ما خواند:&quot; مريم سعادت در 24 شهريورـ انگوري‌ترين ماه سال(!) ـ در خيابان گرگان، پل‌چوبي تهران ، با اطلاع قبلی و آمادگی های لازم به دنیا آمد. پس از تولد متوجه شد که پدرش مهندس راه و ساختمان و مادرش خانه دار است. کمی که بزرگتر شد، هرچه فکر کرد نفهمید چرا به آن پل سیمانی و آهنی می گویند&quot;پل چوبی&quot;، پس تصمیم گرفت به دبستان برود!&lt;BR&gt;پس از تحصیل در دبیرستان جام جم، در کنکور هنری به شدت(!) قبول شد. رشته مورد علاقه اش، طراحی صحنه بود که از معدود رشته های صحنه دار(!) است!! اما در رشته تاتر عروسکی وارد دانشگاه شد  ودر سال ۶۴ لیسانس گرفت.&lt;BR&gt; يك ماه بعد از انقلاب ازدواج كرد و اکنون دو پسر به نام‌هاي آرمين (26 ساله) و ماني (21 ساله) دارد.&quot;&lt;BR&gt;بعد پاي حرف‌هاي خود اين هنرمند خوب نشستيم و در نهايت رضا رفيع به او گفت كه با وجود ايشان، اينجا «سعادت آباد» شده است!&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P class=MsoNormal dir=rtl style=&quot;MARGIN: 0in 0in 0pt&quot;&gt;&lt;B&gt;&lt;SPAN lang=FA&gt;&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;/B&gt;&lt;FONT face=&quot;Verdana, Arial, Helvetica, sans-serif&quot; color=#993300 size=3&gt; &lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P class=MsoNormal dir=rtl style=&quot;MARGIN: 0in 0in 0pt&quot;&gt;&lt;B&gt;&lt;SPAN lang=FA&gt;&lt;FONT face=&quot;Verdana, Arial, Helvetica, sans-serif&quot;&gt;&lt;FONT size=3&gt;&lt;FONT color=#993300&gt;«شكرخند» جاي خوبي است. نه فقط به خاطر آن كه با دوستانتان دور هم جمع مي‌شويد و ديدارها تازه مي‌شود، نه فقط به خاطر آن كه هنرمندان محبوبتان را از نزديك مي‌بينيد و نه فقط به خاطر آن كه تفريح سالمي به شمار مي‌رود، بلكه به خاطر اين كه به نظر مي‌رسد اين روزها مردم به هرچه كه رنگ و بوي طنز و خنده داشته باشد، علاقه خاصي نشان مي‌دهند!&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P class=MsoNormal dir=rtl style=&quot;MARGIN: 0in 0in 0pt&quot;&gt;&lt;B&gt;&lt;SPAN lang=FA&gt;&lt;o:p&gt;&lt;FONT face=&quot;Verdana, Arial, Helvetica, sans-serif&quot; color=#993300 size=3&gt; &lt;/FONT&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;&lt;/DIV&gt;</description>
<pubDate>Mon, 30 Jun 2008 15:53:18 GMT</pubDate>
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<title>اصلاحات!</title>
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<description>&lt;BR&gt;&lt;FONT face=&quot;Verdana, Arial, Helvetica, sans-serif&quot; size=4&gt;&lt;FONT color=#990066&gt;&lt;FONT color=#6600ff&gt;قطعه ای از ترانه&quot; دلم برایت تنگ شده&quot; از کریستی برگ (chris de burgh):&lt;/FONT&gt; &lt;BR&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;FONT size=3&gt;&lt;BR&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;FONT color=#990066&gt;&lt;FONT size=1&gt;I&apos;ve been missing you &lt;BR&gt;I&apos;ve got the roses, I&apos;ve got the wine&lt;BR&gt;With a little luck she will bee here on time&lt;BR&gt;This is the place we used to go&lt;BR&gt;With romantic music and the lights down low&lt;BR&gt;And as you stand there amazed at the door&lt;BR&gt;And you&apos;re wondering what all this is for&lt;BR&gt;It&apos;s just a simple thing from me to you&lt;BR&gt;The lady that I adore, &apos;cos there&apos;s something&lt;BR&gt;That you should know, it&apos;s that&lt;BR&gt;&lt;BR&gt;I&apos;ve been missing you, more than words can say&lt;BR&gt;And that I&apos;ve been thinking about it every day&lt;BR&gt;And the time we had just dancing nice and slow&lt;BR&gt;And I said now I&apos;ve found you&lt;BR&gt;I&apos;m never letting go &lt;BR&gt;&lt;BR&gt;&lt;/FONT&gt;دلم برایت تنگ شده&lt;BR&gt;گل سرخی و جام شرابی &lt;BR&gt;و کمی شانس که تو زود بیایی&lt;BR&gt;همیشه قرارمان همین جاست&lt;BR&gt;نوایی عاشقانه و نوری ملایم&lt;BR&gt;تو بر آستانه در مبهوت می مانی&lt;BR&gt;ازاین فضای عاشقانه&lt;BR&gt;این تحفه ای است برای تو&lt;BR&gt;تویی که می پرستمت&lt;BR&gt;چیزی است که باید بدانی&lt;BR&gt;دلم برایت تنگ شده&lt;BR&gt;کاش می شد گفت چقدر&lt;BR&gt;هر روز در این فکرم&lt;BR&gt;آن لحظه که آرام و نرم رقصیدیم&lt;BR&gt;گفتم دیگر تو را یافتم&lt;BR&gt;نمی گذارم از دستم بروی...&lt;BR&gt;           &lt;FONT size=2&gt;  مترجم: فاطمه تقی پور&lt;BR&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;BR&gt;&lt;FONT color=#6600ff&gt;متن اصلاح شده این ترانه برای اجرا در ایران:&lt;BR&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;BR&gt;دلم برایت تنگ شده&lt;BR&gt;گل محمدی و استکانی چای &lt;BR&gt;و کمی شانس که تو زود بیایی&lt;BR&gt;همیشه در مکان های عمومی قرار می گذاریم&lt;BR&gt;نوایی عارفانه با نور کافی&lt;BR&gt;تو بر آستانه در مبهوت می مانی&lt;BR&gt;ازاین فضای عرفانی &lt;BR&gt;این مهریه توست&lt;BR&gt;تویی که اول خدا دوم مادرم و سوم تو نامزد محرمم&lt;BR&gt;چیزی است که باید بدانی&lt;BR&gt;دلم برایت تنگ شده&lt;BR&gt;اما نه آن قدر تنگ که مصداق تبرج باشد&lt;BR&gt;هر روز در این فکرم&lt;BR&gt;آن لحظه که نرمش صبحگاهی می کردیم&lt;BR&gt;گفتم دیگر تصمیمم را گرفته ام&lt;BR&gt;باید به عقد دائم من دربیایی...&lt;BR&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/FONT&gt;</description>
<pubDate>Thu, 05 Jun 2008 16:48:18 GMT</pubDate>
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<title>شکرخندمان منور!(شکرخند19)</title>
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<description>&lt;BR&gt;&lt;FONT face=&quot;Verdana, Arial, Helvetica, sans-serif&quot; color=#ff33cc size=4&gt;نوزدهمین شکرخند برای من بسیار خوشایند بود، چراکه هم شعر پست قبل که خواندم مورد توجه قرار گرفت، هم ترانه&quot;خلیج فارس&quot; سه پست قبل که&quot;میلاد ترابی&quot;( آهنگساز آلبوم کما از حمید عسکری) برایش آهنگی دامبولی(!) ساخته و فرزاد حسنی و امیر زنده دلان آن را خوانده بودند برای حضار پخش شد، هم به خاطر گزارش هایی که از شب شعر می نویسم تقدیر مادی ـ سکه ای از من به عمل آمد، هم یکی از طرفدارانم!! سبدگلی به من تقدیم کرد، هم دخترخاله و همکلاسی دانشگاه و دوستان دیگرم در جلسه حضور داشتند و همین ها دیگر!&lt;BR&gt;&lt;BR&gt;شکرخند این ماه با استقبال فوق العاده مردم روبه رو شده بود، به طوری که به قول رضا رفیع:&quot; ان شاء ا... روز به روز به رونقش افزوده، تا روزی که تعطیل شود!&quot;( حذف به قرینه لفظی ام، منفجر!)&lt;BR&gt;&lt;BR&gt;وقتی&quot;رضا رشیدی&quot; نقیضه شعر&quot;کوچه&quot;فریدون مشیری را خواند و رضا رفیع، خاطره ای ازآن مرحوم نقل کرد که مامور سرشماری به در منزلشان رفته و با شنیدن اسم و فامیل، ایشان را شناخته بود، و لطیفه ای را هم که می گوید طرف به مامور سرشماری که پرسیده بود شما چند نفرید، می گوید:من یک نفرم، شما چند نفرید؟&quot;، تعریف کرد، یک نفر چنان هیجان زده خندید که رضا رفیع مجبور شد بگوید:&quot;هیجانتان را کنترل کنید... در خانه شما هم می آیند!&quot;( تو درتویی جملاتم منحصر!)&lt;BR&gt;&lt;BR&gt;رضا رفیع، ضمن دعوت از &quot;راشد انصاری&quot;برای شعرخوانی،گفت:&quot;کسانی مثل راشد می کوبند از بندر(عباس) می آیند... یا از بندر می آیند و می کوبند!&quot;&lt;BR&gt;او به &quot;بانی&quot; که طبق معمول، بعد از رفتن روی سن تازه توی جیبش دنبال شعر می گشت گفت:&quot; شما چرا هیچ وقت قبلش در نمی آورید؟&quot; و وقتی حضار خندیدند، توضیح داد:&quot; آخر من همه جا دیده ام که استاد وقتی می آیند بالا، در می آورند...&quot;!(سانسورهایم منفعل!)&lt;BR&gt;&lt;BR&gt;&quot;مهدی فرج الهی&quot;تعدادی کاریکلماتور از خودش و مرحوم&quot;پرویز شاپور&quot;، در مورد مرگ خواند که اینها مال خودش هستند:&lt;BR&gt;&lt;FONT color=#0066ff&gt;غزل خداحافظی همه آدمها را شاعر می کند.&lt;BR&gt;عاقبت در بالماسکه زندگی، رخ در نقاب خاک می کشیم.&lt;BR&gt;&lt;/FONT&gt; &lt;BR&gt;راشد در شعرش که به قول امیرحسین مدرس&quot;خوش قافیه&quot;هم بود، چنین مصرعی داشت:&lt;BR&gt;&lt;FONT color=#0066ff&gt;یک عده کنند مایه خالی!&lt;BR&gt;&lt;/FONT&gt;جالب آن که استاد کاوه هم چنین شعری خواند:&lt;BR&gt;&lt;FONT color=#0066ff&gt;باز می بینم که سر، خم کرده ای&lt;BR&gt; بازهم از شرم، سرخم کرده ای...&lt;/FONT&gt;&lt;BR&gt;و درآن چنین مصرعی داشت:&lt;BR&gt;&lt;FONT color=#0066ff&gt;مایه خالی بود، درهم کرده ای!&lt;BR&gt;&lt;/FONT&gt;دراین حال، تلفن رضا رفیع زنگ خورد و او گفت:&quot; بله، از اماکن هم پشت خط هستند!&quot; و ادامه داد:&quot;یعنی از مکان جام جم!&quot; &lt;BR&gt;&lt;BR&gt;&quot;جمشید مقدم&quot; شعرش را این طور شروع کرد:&lt;BR&gt;&lt;FONT color=#0066ff&gt;کوچیکش کن عزیزم اون عذابو!&lt;BR&gt;&lt;/FONT&gt;و رضا رفیع رسید:&quot; آن ضمیر، اشاره به چی داشت بی مقدمه؟!&quot;&lt;BR&gt;برخلاف تصور او(!)،ادامه شعر این بود:&lt;BR&gt;&lt;FONT color=#0066ff&gt;جدا کن از وجودت اضطرابو&lt;BR&gt;چرا این قدر دس دس می کنی تو؟&lt;BR&gt;عمل کن اون دماغ بی صاحابو!&lt;BR&gt;&lt;BR&gt;&lt;/FONT&gt;به سنت تازه پای جلسه، تعدادی عکس طنزآمیز نمایش داده شد که درپاره ای موارد، توضیحات رضا رفیع از خود عکس طنزآمیزتر بود، مثلا او در شرح عکسی از یک کامیون که راننده، آفتابه اش را در قسمتی از آن نصب کرده بود، گفت:&quot;یاد نامه ای افتادم که زمانی برادرم از هلند برایمان فرستاده و در مورد آن کشور نوشته بود:&lt;BR&gt;در برون، آفتاب پیدا نیست&lt;BR&gt; در درون آفتابه برجا نیست!&quot;&lt;BR&gt; در یکی دیگر از تصاویر، ما پارچه نوشته جالبی را بر سردر یکی از دانشکده های دامپزشکی کشور دیدیم که روی آن نوشته شده بود:&quot; عرصه دامپزشکی، عرصه خدمت به انسان هاست!&quot;&lt;BR&gt;در پارچه نوشته دیگری، خواندیم:&quot; بازگشت پیروزمندانه آقای... از ماه عسل را گرامی می داریم!&quot;&lt;BR&gt;درتصویر دیگر، مردی دیده می شد که کنار خیابان روسری می فروخت و یکی از روسری ها را هم خودش به سر کرده بود تا تبلیغ کرده باشد!&lt;BR&gt;&lt;BR&gt;&quot;شهرام شکیبا&quot; پیش از شعرخوانی گفت:&quot; اول چند کلمه می گویم... مستراح!&quot;&lt;BR&gt;دوست بغل دستی من بلند گفت:&quot; دست بزنیم؟!&quot; و جواب شنید:&quot; هرکاری دوست دارید بکنید!&quot;&lt;BR&gt;کلمات بعدی هم چیزهایی در همین مایه بودند و شاعر توضیح داد:&quot; چون شعر من ازاین چیزها نداشت، گفتم قبلش بگویم!&quot; و در ضمن خدا را شکر کرد که در آخرین تصویرپخش شده، آن مرد به فروش روسری اکتفا کرده بود!&lt;BR&gt;&lt;BR&gt;در بخشی ازجلسه، فیلم سرگرم کننده ای از یک کاندیدای ریاست جمهوری دیدیم که شعار انتخاباتی اش این بود:&quot; رییس جمهور، صراف است، مابقی علاف!&quot;&lt;BR&gt;باآن که درآن فیلم به نظر می رسید آقای صراف، رییس جمهور خوبی ازکار در نمی آید، اما با توجه به قافیه شعار انتخابی انتخاباتی فوق، می شود از ایشان برای شعرخوانی در شب شعر شکرخند دعوت به عمل آورد!&lt;BR&gt;&lt;BR&gt;&quot;سعید نوری&quot; شعر طبق معمول زیبایی را به مناسبت ۱۴ خرداد که روز تولد اوست، به خودش تقدیم کرد.&lt;BR&gt;به گفته رضا رفیع، &quot;داریوش کاردان&quot; سرصحنه فیلمبرداری بود و نتوانست بیاید. رفیع اشاره کرد:&quot;ما نمی دانستیم آقای کاردان هم در فیلمهای &quot;صحنه&quot; دار بازی می کند!&quot;&lt;BR&gt;&lt;BR&gt;او در ادامه گفت:&quot; خط فقر در تهران ۷۸۰ هزارتومان محاسبه شده. با این حساب، خیلی از کارمندها مفقود الاثرند! ماهم حساب کردیم دیدم محویم، حالا یا محو همدیگر هستیم یا کلا محو شده ایم!&quot; &lt;BR&gt;&lt;BR&gt;میهمان ویژه این ماه که مثل دو برادر بزرگتر و کوچکتر از خودش، در روز اول بهمن ماه(مصادف با دوم سپتامبرالحرام!) یکی از سالها به دنیا آمده ، صمیمیت و صداقت مجذوب کننده ای داشت.او در خیابان ایران تهران( ما تا حالا فکر می کردیم تهران جزو ایران است، نگو برعکس بوده!) متولد شده و تصادف این ولادت در سال ۴۵، با ولادات برادران در سال های ۴۳ و ۵۰، خبر از اهل حساب و کتاب بودن پدرش و در نظر داشتن چشم انداز اقتصادی خانواده برای برگزاری جشن تولد هرسه فرزنددر یک روز می دهد!&lt;BR&gt; &lt;BR&gt;&quot;&lt;FONT color=#0066ff&gt;بهرام عظیمی&lt;/FONT&gt;&quot;، کاریکاتوریست و انیماتور معروف که برخلاف چهره نسبتا جدی اش، خیلی دوست داشتنی و بانمک می باشد، سازنده شخصیت های تلویزیونی تبلیغاتی از جمله &quot;سیا ساکتی&quot; و &quot;خطرناکه حسن&quot;! است.البته خود او درابتدای سخنانش گفت:&quot;من تا امروز فکر می کردم بانمکم اما در این جمع دیگر این طور فکر نمی کنم!&quot;&lt;BR&gt;هنگام پخش چند کاریکاتور از او، وسط توضیح یکی ازآنها که مار کوچکی را نشان می داد که با هدیه ای به دیدار مار بسیار بزرگی که عاشقش شده رفته بود(&quot; که&quot; هایم منسجم!)، اعتراف صادقانه او به دل همه نشست که(منسجم تر!):&quot; من در زندگی همیشه این مار کوچیکه بودم! به خدا این قدر پول خرج هدیه کردم... اما نامردها...!!&quot; &lt;BR&gt;او که تیپ و قیافه ای خاص دارد، گفت از سوی یک کارگردان بنام، برای ایفای نقش میرزا کوچک خان جنگلی دعوت شده و اشاره کرد:&quot;البته این بار قرار است به قسمت هایی از زندگی میرزا کوچک خان پرداخته شود که تا حالا به آنها پرداخته نشده، از جمله قسمت هایی که او با زنش تنهاست ومن خدا را شکر کردم که قرار است باما به آن بپردازند و کنجکاوم که نقش مقابلم چه کسی است!&quot; رضارفیع گفت:&quot; ان شاءا.. که جنیفر لوپز باشد... بیمه هم هست!!&quot;&lt;BR&gt;وقتی بهرام عظیمی از سن پایین آمد و با استادش، آقای کاوه روبوسی کرد، ازآنجا که هر دویشان موهای بلندی دارند، به آنها گفته شد:&quot;موهایتان قاطی نشود!&quot;&lt;BR&gt;&lt;BR&gt;&quot;رضا ساکی&quot; به نوبه خود، به تعدادی از تبلیغات به ظاهر جدی اشاره کرد که آخر طنزند:&lt;BR&gt;&lt;FONT color=#0066ff&gt;فیلمبرداری از تمام مراحل ازدواج!&lt;BR&gt;عروس، سرویس می کنیم!&lt;BR&gt;رفع کم مویی شما با کاشت مو از هرجای بدن!&lt;BR&gt;وسط میرداماد، ۹۰ متر!&lt;BR&gt;&lt;BR&gt;&lt;/FONT&gt;گزارش های شکرخندمان مداوم!&lt;BR&gt;&lt;/FONT&gt;</description>
<pubDate>Sun, 25 May 2008 20:45:18 GMT</pubDate>
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<title>گشت شاد!</title>
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<description>&lt;BR&gt;&lt;FONT color=#990066&gt;    &lt;IMG style=&quot;WIDTH: 268px; HEIGHT: 202px&quot; height=322 alt=&quot;گشت شاد!&quot; hspace=0 src=&quot;http://irapic.com/uploads/1211269541.jpg&quot; width=456 align=baseline border=0&gt;&lt;BR&gt;&lt;BR&gt;&lt;BR&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;FONT face=&quot;Verdana, Arial, Helvetica, sans-serif&quot; color=#990066 size=4&gt;خیابان و من و یک گشت ارشاد&lt;BR&gt;نگاه من به اسم پشتش افتاد&lt;BR&gt;کسی، ازشیشه&quot;اِر&quot; را پاک کرده&lt;BR&gt;به رندی کرده بود &quot;ارشاد&quot; را &quot;شاد&quot;!&lt;BR&gt;&lt;BR&gt;الا ارشادیون ِ توی ون ها!&lt;BR&gt;غضب بنموده بر جمع خفن ها!&lt;BR&gt;به مردان، مردهاتان کار دارند&lt;BR&gt;و زن هاتان به سرتاپای زن ها!&lt;BR&gt;&lt;BR&gt;اگر برخوردتان&quot; گیر سه پیچ&quot;است&lt;BR&gt;چنان پیچیدن یک ساندویچ است&lt;BR&gt;نتیجه می شود بدجور، معکوس&lt;BR&gt;در آخر، راندمان کار، هیچ است!&lt;BR&gt;&lt;BR&gt;جوان، مثل فنر یا کش به تنبان&lt;BR&gt;بود از هرفشار ِ بد، گریزان&lt;BR&gt;اگر گردد فشار از حد خود، بیش&lt;BR&gt;فنر، بیش از گذشته می پرد هان!&lt;BR&gt;&lt;BR&gt;نباید پس کنید&quot;امر به منکر&quot;&lt;BR&gt;که او گردد به کارش خیره سرتر&lt;BR&gt;نگردد کارتان&quot; نهی ز معروف&quot;&lt;BR&gt;مواظب بود باید ای برادر!&lt;BR&gt;&lt;BR&gt;اگر در کارتان نقاد باشید&lt;BR&gt;پذیرای کمی ارشاد باشید&lt;BR&gt;همان طوری که آن رند بلا گفت&lt;BR&gt;ازاین پس گشت هایی شاد باشید!&lt;BR&gt;&lt;BR&gt;&lt;FONT size=3&gt;نوزدهمین شب شعر طنز شکرخند، شنبه ۴ خرداد از ساعت ۵ تا ۸ عصر در فرهنگسرای ارسباران برگزار می شود.&lt;BR&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/FONT&gt;</description>
<pubDate>Mon, 19 May 2008 15:01:18 GMT</pubDate>
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<title>ما به چه چیز این شعرها باید بخندیم؟!( شکرخند 18)</title>
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<description>&lt;BR&gt;&lt;FONT face=&quot;Verdana, Arial, Helvetica, sans-serif&quot; color=#cc0099 size=4&gt;ازآنجا که به قول رضا رفیع اول هر سال باید برای مسائل مالی و ماستمالی(!) هر نوع جلسه ای، برنامه ریزی شود، تا آخرین ساعات، برگزار شدن یا نشدن شکرخند این ماه در پرده ای از ابهام بود. برگزاری یا برنگزاری؟ مساله این است!&lt;BR&gt;&lt;BR&gt;بالاخره جلسه برگزار شد، البته با تاخیر نسبتا زیاد که علاوه بر ملت گرما زده، آقایی را در ردیف جلوی ما چنان شاکی کرده بود که ایشان ناگهان برگشت طرف ما و بی مقدمه گفت:&quot; ما به چه چیز برنامه های طنز تلویزیونی بعد از انقلاب باید بخندیم؟! هیچ کس به این مردم احترام نمی گذارد. یک ساعت است که ملت در گرما منتظرند! آن هم از طنزهای تلویزیون!...&quot; همان طور که ایشان در حال انتقاد سازنده و نوازنده (!) بود و ما به ارتباط تاخیر در شروع جلسه با طنزهای شبانه فکر می کردیم، دوستمان گفت:&quot; مهران مدیری که خوب برنامه می سازد!&quot; و طرف با اطوار جالبی جواب داد:&quot; اِ؟ نه بابا!!&quot;&lt;BR&gt; این آقا بعد از آن که کسی شعر می خواند می رفت پیش او و چیزی زیر گوشش می گفت. ما حدس می زدیم که می پرسد:&quot; ما به چه چیز این شعر تو باید می خندیدیم؟!&quot; بعد هم درست وسط شعرخوانی طنازها همان طور بی مقدمه رفت بالای سن و کاغذی جلوی رضا رفیع گذاشت و گفت:&quot; شماره ات را بنویس!&quot; او هم بدون آن که متوجه خطری که متوجهش بود باشد(!)، نوشت! البته گفت:&quot; فکر کنم شماره خودم است... اگر نبود ببخشید!&quot;&lt;BR&gt;&lt;BR&gt;این ماه به دلیل آن که امیرحسین مدرس و داریوش کاردان هردو سر فیلمبرداری بودند، رضا رفیع به تنهایی اجرای شکرخند را بر عهده داشت. او گفت:&quot; داریوش کاردان سر فیلم کلاه پهلوی یا کلاه های دیگر و به هرحال مشغول کلاه (برداری...؟! یا گذاری؟) است! البته سیاست تک مجری بودن فوایدی هم دارد، از جمله آن که یک بطری آب معدنی در مصرف آب، که با توجه به خشکسالی پیش رو بهتر است مثل سوخت، سهمیه بندی و مثلا با &quot;کارت رفع سوخت&quot;(!) توزیع شود، صرفه جویی خواهد شد! به هرحال  این جلسه من تنها به تو می اندیشم... نه، ببخشید، تنها اجرا می کنم!&quot;&lt;BR&gt;او برای آن که از حضور اساتید مسن تر در جلسه تشکر کند، گفت:&quot; ان شاء ا... در مراسم شما شرکت کنیم!&quot;&lt;BR&gt;بعد هم یاد آوری کرد که در ایام نوروز ۷۲ میلیون تن از هموطنانمان به مسافرت رفته اند و گفت:&quot; هرچه حساب کردم دیدم وقتی از۷۵ میلیون نفر، ۷۲ میلیونش رفته اند سفر، پس ما واقعا ملت شادی هستیم، چون آن سه میلیون باقی مانده هم حتما دزد بوده اند و به دلیل مترصد فرصت بودن، عذر داشته اند! لیس علی الدزد حرج!!&quot;&lt;BR&gt;او اشاره کرد که دیروز در یک مراسم ازدواج دانشجویی در دانشگاه امیر شریف(!)، با حضور ۱۷۹ زواج(!) دانشجو شرکت کرده و نفهمیده چرا با افزودن یک زوج، تعداد را رند نکرده اند!  او ادامه داد:&quot; اصولا جنبش های دانشجویی چند دسته اند، از جمله همین جنبش های عاطفی که بالاخره عده ای جنبیده اند و ازدواج کرده اند یا در حال جنبیدن بودند و من دیدم!&quot;&lt;BR&gt; &lt;BR&gt;نادر ختایی در برنامه رادیویی &quot;طنز متفاوت&quot;، با رضا رفیع تماس گرفته و بدون آن که به او اطلاع بدهد، صدا را فرستاده بود روی آنتن. وقتی ختایی برای شعرخوانی رفت، رضا رفیع به او گفت:&quot; نترسیدید که من حرفی بزنم که نباید پخش می شد؟&quot; و جواب شنید:&quot; می شد طنز متفاوت دیگر! اگر هم حرف متفاوتی می زدی، به گونه ای متفاوت می گرفتندت!&quot; &lt;BR&gt;رضا رفیع گفت:&lt;BR&gt;&quot; همه هست آرزویم که ببینمت ختایی!&lt;BR&gt;چه زیان تو را که من هم برسم به...&quot;؟&lt;BR&gt;نادر گفت:&quot; به یه جایی!&quot; که باید می گفت:&quot; چه زیان مرا که من هم برسم به یک رضایی!&quot;&lt;BR&gt;&lt;BR&gt;مهدی استاد احمد پیش از شعرخوانی به این نکته اشاره کرد که نشانی فرهنگسرای محل برگزاری شکرخند، مشکوک است و &quot;خیابان جُلفا&quot; را می شود خواند&quot;خیابان جِلفا&quot;!! رضا رفیع مچش را گرفت که:&quot; شما با این تلفظ آمدید اینجا؟!&quot; و استاد احمد کم نیاورد:&quot; ما اصولا با این تفکر آمده ایم!&quot;&lt;BR&gt;استاد احمد از مسولان سالن خواست آرم شکرخند را بیندازند روی پرده تا با اشاره به ابروی مردی که کاریکاتورش در تصویر مشاهده می شود، بگوید:&quot; ابروی دسته دار این آقا من را به یاد املت دسته دار( کتاب اشعار طنز ناصر فیض) می اندازد، همین!&quot;&lt;BR&gt;این بیت ازاو خواندنی است:&lt;BR&gt;&lt;FONT color=#6600cc&gt;&quot; ابر و باد و مه و خورشید و فلک در کارند&lt;BR&gt;حل نمودیم به کل معضل بی کاری را!&quot;&lt;BR&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;BR&gt;رضا رفیع از کنفرانس بودار(!) توالت که با حضور ۸۵ کشور صاحب دستشویی(!) در چین برگزار شده بود تعریف کرد و گفت:&quot;در مالزی توالت هایی هست که تا طرف دستش را نشوید، درشان باز نمی شود و اینجاست که می فهمیم سیاست درهای بسته جواب می دهد، حداقل در دستشویی!&quot;&lt;BR&gt; &lt;BR&gt;&quot;سعید نوری&quot; نقیضه ای برای شعر جلسه پیش خودش سروده بود:&lt;BR&gt;&lt;FONT color=#6633cc&gt;وقتی مجردی به زنان فکر هم نکن!&lt;BR&gt;چیزی نگو، نبین و نخوان، فکر هم نکن!&lt;BR&gt;هرگز به یک جوان ولو زن نمی دهند&lt;BR&gt;زین رو به ازدواج، جوان! فکر هم نکن!&lt;BR&gt;بی تربیت سراغ زنی رفته ای اگر&lt;BR&gt;بی صیغه هیچ گاه به آن فکر هم نکن!&lt;BR&gt;بسپار دست حضرت حق جسم خویش را&lt;BR&gt;دیگر به ایدز یا یرقان فکر هم نکن!&lt;BR&gt;وقتی توکلت به خداوندگار شد&lt;BR&gt;آسوده شو، به کون و مکان فکر هم نکن!&lt;BR&gt;فرضا زنی ستاندی و ناکامی ات گذشت&lt;BR&gt;دیگر به خیل نرمتنان فکر هم نکن!&lt;BR&gt;قدری به نیمسوخته چوب دوزخی&lt;BR&gt;اندیشه کن ولی به فلان فکر هم نکن!&lt;BR&gt;گر ناخدای کشتی عمرت زنت شود&lt;BR&gt;هرگز به ساحلی ملوان! فکر هم نکن!&lt;BR&gt;در آسمان هفتم اگر چرخ می زدی&lt;BR&gt;حالا به آسمان، خلبان! فکر هم نکن!&lt;BR&gt;در فکر ران و سی نه مرغی ولی ندا&lt;BR&gt;آمد: خفه! ببند دهان! فکر هم نکن!&lt;BR&gt;ناموس ما نشسته در این جمع بی ادب!&lt;BR&gt;در این مکان به سی نه و ران فکر هم نکن!&lt;BR&gt;در جیب هات سیل شپش موج می زند&lt;BR&gt;شلوار خویش را بتکان، فکر هم نکن!&lt;BR&gt;ما خودکفا شدیم ز گندم ولی جوان!&lt;BR&gt;در دولت نهم تو به نان فکر هم نکن!&lt;BR&gt;&lt;/FONT&gt;در این قسمت که با تشویق شدید حضار روبه رو شد، رضا رفیع توضیح داد:&quot; البته کلا در هر دولتی نباید هم و غم آدم فقط نان باشد!&quot; شاعر گفت:&quot; اینها را گفتید که رفو شود، ولی من دوباره تکرار می کنم:&lt;BR&gt;ما خودکفا شدیم ز گندم ولی جوان!&lt;BR&gt;در دولت نهم تو به نان فکر هم نکن!&quot;&lt;BR&gt;و رضا رفیع دوباره گفت:&quot; البته کلادر هر دولتی...!!&quot;&lt;BR&gt;&lt;FONT color=#6633cc&gt;وقتی که هسته های اتم هست، نان چرا؟&lt;BR&gt;بشکاف هسته را ز میان، فکر هم نکن!&lt;BR&gt;جانم فدای صلح و انرژی هسته ای&lt;BR&gt;جان را چه ارزشیست؟ به جان فکر هم نکن!&lt;BR&gt;&lt;/FONT&gt;رفیع:&quot; البته در خیلی از دولت ها این قضیه هست!! کلا فکریدن کار خوبیست!&quot;&lt;BR&gt;&lt;FONT color=#6633cc&gt;شاعر! به بیت های سیاسی رسیده ای!&lt;BR&gt;پشت خطوط سرخ بمان! فکر هم نکن!&lt;BR&gt;هر گونه فکر خواست دلت در نهان بکن&lt;BR&gt;اما تو در خصوص بیان فکر هم نکن!&lt;BR&gt;دائم بخور، بکش، بچر، آروغ بزن ولی&lt;BR&gt;قفلی بزن به روی زبان، فکر هم نکن!&lt;BR&gt;ای کاش خواهشی بشود از خدا چنین:&lt;BR&gt;بی کار می شوی به جهان فکر هم نکن!&lt;BR&gt;یارب دگر به نعش زمینی که مانده است&lt;BR&gt;بر روی دست های زمان، فکر هم نکن!&lt;BR&gt;دیگر به بازسازی دنیا و مردمش&lt;BR&gt;حتی شما امام زمان فکر هم نکن!&lt;BR&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;BR&gt;رضا رفیع:&quot; ولی شعر ایشان حاصل فکر زیاد بوده ها!&quot;&lt;BR&gt;&lt;BR&gt;یک نفر از حضار آماری از انتخابات اخیر را روی تکه کاغذی نوشته و دست به دست به دست رضا رفیع رساند که ادعا می کرد از هشت میلیون واجد شرایط شرکت در انتخابات تهران، تنها هفتصد هزار نفر در آن شرکت کرده اند. رفیع که خودش مطبوعاتی است، گفت:&quot; قبل از اعلام رسمی رسانه ها نمی شود به آمار متفرقه استناد کرد... به نظر می رسد این آمار غلط است... غلط زیادی هم هست!&quot;&lt;BR&gt;&lt;BR&gt;آقای &quot;صناعی&quot;(؟) شعر جالبی خواند:&lt;BR&gt;&lt;FONT color=#6633cc&gt;&quot;امداد ای عزیزان!&lt;BR&gt;دزدان برهنه کردند حاجی غلامرضا را&lt;BR&gt;می کند جامه ها و &lt;BR&gt;پیژامه را و می گفت:&lt;BR&gt;دردا که راز پنهان، خواهد شد آشکارا!&quot;&lt;BR&gt;&lt;BR&gt;&lt;/FONT&gt; وقتی رضا بنفشه خواه گفت چشمهایش را عمل کرده، کسی از میان جمعیت داد زد:&quot; پس آقای بنفشه خواه هم عملی شد!؟&quot; و رضا رفیع هم جواب داد:&quot; به عمل کار برآید!&quot;&lt;BR&gt;&lt;BR&gt;سرانجام وقتی از سالن بیرون می آمدیم مردی با خوشحالی به رضا رفیع گفت:&quot; من هم کرجی هستم، خوشحالم که شما همشهری ما هستید!&quot; رفیع جواب داد:&quot; اما من که کرجی نیستم!&quot; و  چون دید حال طرف گرفته شده، ادامه داد:&quot; البته گاهی به کرج می آییم!&quot;&lt;BR&gt;&lt;/FONT&gt;</description>
<pubDate>Sun, 27 Apr 2008 11:36:18 GMT</pubDate>
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<title>خلیج همیشگی فارس</title>
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<description>&lt;FONT face=Verdana color=#cc0066 size=4&gt;  &lt;BR&gt;همین حالا افشین حسین خانی زنگ زد و پرسید آیا می توانم تا فردا عصر یک شعر ضربی با سوژه روز، مثلا استفاده از نام جعلی &quot;خلیج عربی&quot; به جای&quot;خلیج فارس&quot; توسط گوگل، برای برنامه&quot; روز هشتم&quot; ( برنامه صبح جمعه شبکه رادیویی جوان) بگویم تا او و فرزاد حسنی اجرایش کنند؟&lt;BR&gt;البته که می توانستم! وقتی نیم ساعت بعد به او اطلاع دادم که شعر آماده است، از سرعت عملم متعجب شد و خیال کرد آن را از آرشیوم برداشته ام. گفتم: فکر کن آرشیو اشعارم شعر ضربی با سوژه اسم مجعول خلیج عربی داشته باشد!&lt;BR&gt;شاید یک شعرنسبتا فی البداهه ضربی، برای نقل دراین وبلاگ چندان مناسب نباشد اما بالاخره اینجا باید آپ بشود یا نه؟! ما هم که مدتی است فقط وقتی دوستان سفارش شعر می دهند چیزی می نویسیم و بس!&lt;BR&gt;&lt;BR&gt;تو که اسمت گوگله، سَرور دنیای وبی&lt;BR&gt;مثلا منشا تحقیق علوم و ادبی&lt;BR&gt;اطلاعات تو تکمیله می گن، نیم وجبی!&lt;BR&gt;اگه خیلی حالیته پس چرا اِنقَد جلبی؟&lt;BR&gt;خلیج فارسو چرا کردی خلیج عربی؟!&lt;BR&gt;&lt;BR&gt;اینجا اسمش همیشه فارس بوده، حقه نزن&lt;BR&gt;دیگه اینو همه عالم و آدم می دونن&lt;BR&gt;خیلی وقته دیگه دستت رو شده واسه من&lt;BR&gt;به گمونم که دچار هذیون های تبی&lt;BR&gt;خلیج فارسو چرا کردی خلیج عربی؟!&lt;BR&gt;&lt;BR&gt;ادعات می شه که جغرافی رو بالکل بلدی&lt;BR&gt;چه گلی روی سر نقشه جغرافی زدی!&lt;BR&gt;کردی ثابت که تو این رشته تو نیستی عددی&lt;BR&gt;اطلاعاتو یهو کردی عوض نصفه شبی!&lt;BR&gt;خلیج فارسو چرا کردی خلیج عربی؟!&lt;BR&gt;&lt;BR&gt;ما که حالیمونه آقا که اینا کار کیه!&lt;BR&gt;موشی که هرشب و هر روز توی انباره کیه!&lt;BR&gt;اونی که دشمن ایرانه و مکاره کیه&lt;BR&gt;نکن این جوری که ما رو بکنی هی عصبی&lt;BR&gt;خلیج فارسو چرا کردی خلیج عربی؟!&lt;BR&gt;&lt;BR&gt;&lt;BR&gt;تو یه میلیون می خوای امضا بکنیم؟ باشه رییس!&lt;BR&gt;تو بگو بیشتر ازاین! امضا می دیم، مشکلی نیس!&lt;BR&gt;برو زود اسم درستو روی نقشه بنویس&lt;BR&gt;ولی باس جواب بدی به نسل بعد و عقبی&lt;BR&gt;خلیج فارسو چرا کردی خلیج عربی؟!&lt;BR&gt;&lt;BR&gt;&lt;BR&gt;اگر تا کنون درخواست بازگرداندن نام اصلی و اصیل خلیج فارس از گوگل را امضا نکرده اید همین حالا به نشانی زیر مراجعه کنید:&lt;BR&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;A href=&quot;http://www.petitiononline.com/sos02082/petition.html&quot;&gt;&lt;FONT face=Verdana color=#cc0066 size=4&gt;http://www.petitiononline.com/sos02082/petition.html&lt;/FONT&gt;&lt;/A&gt; </description>
<pubDate>Tue, 15 Apr 2008 10:07:18 GMT</pubDate>
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<title>سال موش</title>
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<description>&lt;BR&gt;&lt;FONT color=#cc0000&gt;این شعر نسبتا فی البداهه را برای یک برنامه نوروزی رادیویی سرودم که صبح یکی ازهمین روزها(احتمالا هفتم فروردین) با صدای خودم از شبکه جوان پخش خواهد شد.&lt;BR&gt;&lt;BR&gt;&lt;FONT face=&quot;Verdana, Arial, Helvetica, sans-serif&quot; size=4&gt;چنین سالی که سال موش باشد&lt;BR&gt;بود سالی که موشی توش باشد!&lt;BR&gt;حواست را بنابراین بکن جمع&lt;BR&gt;که هر دیوار را صد گوش باشد&lt;BR&gt;شنیدم موش سال احتکار است&lt;BR&gt;که الگوی همه یک موش باشد&lt;BR&gt;همه چون موش در انبار کالا&lt;BR&gt;واینها حرکتی خودجوش باشد!&lt;BR&gt;و هرکس فکر جمع پول و مال است&lt;BR&gt;چه در تجریش و چه در شوش باشد&lt;BR&gt;گذارد بر سرت هرکس کلاهی&lt;BR&gt;اگر نسبت به تو باهوش باشد&lt;BR&gt;به کارت موش هایی می دوانند&lt;BR&gt;و عیدی های تو پاپوش باشد!&lt;BR&gt;به زیر کاسه باشد نیم کاسه&lt;BR&gt;اگر زیرش نباشد، روش باشد!&lt;BR&gt;مواظب باش اگر کارت خراب است&lt;BR&gt;به روی کار ِ تو سرپوش باشد!&lt;BR&gt;ویا سرپوش اگر رویش نباشد&lt;BR&gt;اقلا دائما پهلوش باشد!&lt;BR&gt;اگر لو رفت کارت، باش خونسرد&lt;BR&gt;بگو این کار، کار بوش باشد!&lt;BR&gt;بگو کار فوتوشاپ است اینها&lt;BR&gt;بگو این حاصل روتوش(!) باشد!&lt;BR&gt;&lt;BR&gt;... الهی بگذرد اینها به هرحال&lt;BR&gt;به کامت سال موشان، نوش باشد.&lt;/FONT&gt;&lt;/FONT&gt; </description>
<pubDate>Thu, 20 Mar 2008 07:43:18 GMT</pubDate>
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<title>شکرخند 17</title>
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<description>&lt;BR&gt;&lt;FONT face=&quot;Verdana, Arial, Helvetica, sans-serif&quot; color=#990066 size=4&gt;شکرخند این ماه، نه تاریخش مطابق همیشه، شنبه اول ماه بود و نه مجری شماره دویش، امیرحسین مدرس. این بار داریوش کاردان در کنار رضا رفیع قرار گرفت که مثل ترکیب رفیع و مدرس یا رفیع و شهرام شکیبا، خوشمزگی های خاص خودش راداشت! او در طول جلسه، چندین بار به رضا رفیع گیر داد که چرا زن نمی گیرد، به طوری که اواخر برنامه، حتی در مواردی نامربوط، این قضیه را می کشید وسط که البته &quot;وسط&quot; هم به دلیل اطلاع نداشتن عده کثیری از ملت در مورد تغییر زمان شکرخند اسفند ماه ، یا به دلیل اطلاع داشتن عده کثیر دیگری درمورد نزدیکی شب عید و لزوم درآوردن چشم بازارهای خرید، کمی تا قسمتی خالی مانده بود!&lt;BR&gt;&lt;BR&gt;رضا رفیع ضمن تعریف یک خاطره در باب این که برای کاهش بار ترافیک و به خاطر این که&quot; ترافیک، باردار نباشد&quot;(!)، بهتر است از پیک بادپا استفاده شود، به کاردان گفت:&quot; یک بار جای شما خالی قرار بود بروم عروسی... جای شما نه خالی(!) رفتم حمام...&quot; کاردان به شکایت گفت:&quot; حالا مگر چه می شد من هم بودم؟! تمیز می شدم دیگر!&quot; رفیع جواب داد:&quot; حمامهای حالا که جای یک نفر را هم ندارد، خودت می روی تو باید دوش را بگذاری بیرون!&quot; و ادامه داد:&quot;در حمام بودم، پیک بادپایی که مطلبی را توسط او برای دوستی در جشنواره ای فرستاده بودم برگشت و حالا زنگ نزن کی زنگ بزن!... خلاصه ما در چارچوب در و موازین و شئونات(!)، پرسیدیم چه شده و طرف گفت:&quot; آقا شما بسته ای را که فرستاده بودید، لازم داشتید؟! اگر لازم داشتید بروم توی اتوبان دنبالش بگردم!!&quot; معلوم شد که بین راه، مطالب مرا باد برده و آنجا بود که من فهمیدم چرا به اینها می گویند پیک&quot;باد&quot;پا!&quot;&lt;BR&gt;بعد ازآن، رفیع در همان حمام تک نفره شعری هم درباره این داستان سروده بود که این طور شروع می شد:&lt;BR&gt;&lt;FONT color=#3300ff&gt;آن پیک نامور که برفتش به سوی دوست&lt;BR&gt;دیدی چگونه گند زد او روبه روی دوست؟!&lt;BR&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;BR&gt;&quot;فاضل ترکمن&quot; و من، اشعاری خواندیم که قافیه شان&quot;اوش&quot; بود، مثلا شعر من این طور شروع می شد:&lt;BR&gt;&lt;FONT color=#3300ff&gt;چنین سالی که سال موش باشد&lt;BR&gt;بود سالی که موشی توش باشد!&lt;BR&gt;&lt;/FONT&gt;یکی از قوافی هم&quot;بوش&quot; بود.&lt;BR&gt;کاردان اشاره کرد که قافیه جالبی است و رفیع گفت:&quot; امیدوارم سال آینده جرج بوش کنار برود.&quot;&lt;BR&gt;کاردان رندانه رسید:&quot; کنار برود یا کنار بیاید؟!&quot;&lt;BR&gt;&lt;BR&gt;رضا رفیع حکایتی در مورد &quot;جحا و دزد&quot; تعریف کرد و بعد ازآن بی توجه، ادامه داد:&quot; در همین راستا(!) از معاون فرهنگی دانشگاه آزاد دعوت می کنیم چند کلمه ای برایمان حرف بزنند!!&quot; &lt;BR&gt;او همچنین پس از خواندن شعری از برادرش و تقدیم آن به دوستان خبرنگار، ادعا کرد&quot;سرقت ادبی هم یکی از صنایع ادبی است!&quot;&lt;BR&gt;&lt;BR&gt;&quot;سعید نوری&quot;، طنزپرداز بسیار خوش قریحه، پس از قرار گرفتن پشت تریبون به مجریان برنامه گفت:&quot; من  قصیده‌ ء&quot; فکر می کنی&quot; را در اینجا نخوانده ام. اجازه هست بخوانم؟&quot; کاردان با لحن جالبی جواب داد:&quot; فکر نکنم!!&quot;&lt;BR&gt;این ابیات ازآن قصیده، بضاعت من است در تند نویسی!:&lt;BR&gt;&lt;FONT color=#3300ff&gt;وقتی مجردی، به زنان فکر می کنی!&lt;BR&gt;دایم به این همه خفقان فکر می کنی&lt;BR&gt;هرگز به یک جوانِ ولو، زن نمی دهند&lt;BR&gt;زین رو به ازدواج نهان فکر می کنی!&lt;BR&gt;تا می روی سراغ زنی، زرد می کنی&lt;BR&gt;زیرا به ایدز یا یرقان فکر می کنی!&lt;BR&gt;گیرم که ترس از مرض ایدز هم نبود&lt;BR&gt;اینک نشسته ای به مکان فکر می کنی!!&lt;BR&gt;گیرم که باز مشکل جا هم ردیف شد&lt;BR&gt;بی پولی و به قیمت آن فکر می کنی!...&lt;BR&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;BR&gt;رضا رفیع گفت:&quot; گفتم چرا سعید به دیوار تکیه داده بود و فکر می کرد!؟!&quot;&lt;BR&gt;&lt;BR&gt;&lt;FONT color=#3300ff&gt;... فرضا زنی ستاندی و ناکامی ات گذشت&lt;BR&gt;حالا چرا به موی و میان فکر می کنی؟!&lt;BR&gt;این اشتهای زن طلبی نیست، اژدهاست&lt;BR&gt;در خواب هم به این سرطان فکر می کنی&lt;BR&gt;در جیبهات سیل شپش موج می زند&lt;BR&gt;اما فقط به سینه و ران فکر می کنی!&lt;BR&gt;منظور ران و سینه مرغ است بی ادب!&lt;BR&gt;آخر چرا شما به همان فکر می کنی؟!&lt;BR&gt;...&lt;BR&gt;&lt;/FONT&gt;کاردان که بدش نمی آمد به مناسبت این شعر هم به رضا رفیع گیر بدهد، متوجه شد که او مشغول صحبت با موبایل است، بنابراین گفت:&quot; شما هم با تلفن رد گم نکن، می دانم که داری به فلان(!) فکر می کنی!!&quot;&lt;BR&gt;&lt;BR&gt;این دوبیتی از سعید نوری هم شنیدنی است:&lt;BR&gt;&lt;FONT color=#3300ff&gt;درسته ایکس لارجه سایز ِ بینی&lt;BR&gt;با این ریختت هنوزم نازنینی&lt;BR&gt;اگر دیدت کمی اشکال داره&lt;BR&gt;دماغت رو عمل کن تا ببینی!&lt;BR&gt;&lt;BR&gt;&lt;/FONT&gt;استاد بانی هم طی بیتی نصیحت آمیز به رضا رفیع گفت:&lt;BR&gt;&lt;FONT color=#3300ff&gt;من آنچه شرط بلاغ است با تو می گویم&lt;BR&gt;تو خواه از سخنم پند گیر و خواه عیال!!&lt;BR&gt;&lt;/FONT&gt;من هم پیشنهاد می کنم رضا رفیع زودتر فکری برای تجرد خودش بکند که نصف گزارش شکرخند نشود شرح تلاش اطرافیان برای سر و سامان دادن ایشان!&lt;BR&gt;&lt;BR&gt;در قسمتی از برنامه، رضا رفیع با منوچهر آذری تلفنی تماس گرفت و سریع گفت:&quot; شما الان روی آیفون هستید، فلذا چیز خاصی نگویید!&quot; &lt;BR&gt;آقای آذری گفت که سیروس مقدم در سریال نوروزی&quot;پیامک از دیار باقی&quot;، نقش کوچکی هم به او داده و رضا رفیع پرسید:&quot; یعنی نقش پیامک را دارید؟!&quot;&lt;BR&gt;سپس، آذری اجازه خواست کاردان را تلفنی ببوسد و جواب شنید که&quot; شرعا بلا اشکال است!&quot; کاردان با منوچهرآذری حرف زد و در حالی که مشکل آنتن وجود نداشت، با شکسته حرف زدن، وانمود کرد که صدایش قطع و وصل می شود و ما کلی خندیدیم!&lt;BR&gt;&lt;BR&gt;میهمان این ماه در سال ۱۹۴۰ میلادی الحرام(!) به دنیا آمده بود. با تولد او ، جنگ جهانی دوم رسما شروع شد! ایشان باآن که  لیسانس جغرافیا گرفته بود، زبان انگلیسی تدریس می کرد و با توفیق همکاری داشت تا آن که در سال۱۳۵۰ توفیق، توقیف، یا به قول خودش&quot;تو قیف&quot; شد. پس ازآن که گل آقا دوباره بچه های توفیق را دور هم جمع کرد، او هم به آنها پیوست و تا آخرین شماره هفته نامه گل آقا با آن همکاری داشت و وجود &quot;گربه&quot; پای ثابت کاریکاتورهای ایشان بود. او به گاو و چلو کباب علاقه خاصی دارد!&lt;BR&gt;&quot;ناصر پاکشیر&quot;در سال ۴۲ با موفقیت، تن به ازدواج داده و دو پسر دارد: آقا بهروز، مهندس مکانیک و آقا پیمان، فوق لیسانس هوافضا.&lt;BR&gt;این کاریکاتوریست کهنه کار طی حرف هایش، چنین گفت:&quot;من به &quot;گاو&quot; واقعا علاقه دارم و از چند جهت نیز به هم شباهت داریم! نام خانوادگی من&quot;پاکشیر&quot;است و گاو هم شیر دارد! از این موضوع سوءاستفاده هم شده، به طوری که کارخانه معروف&quot;شیر پاک&quot; اسم مرا برای خودش پس و پیش کرده  و من چون آدم لارجی هستم اصلا به روی خودم نیاوردم، در حالی که می توانستم آنها را&quot;سو&quot;(SUE) کنم!&quot;&lt;BR&gt;کاردان پرسید:&quot; به کدام سو؟!&quot; &lt;BR&gt;- &quot; نمی دانم، برای همین هم از تعقیب قانونیشان دست برداشتم!&quot;&lt;BR&gt;پاکشیر ادامه داد:&quot;بارها به من گفته اند گاو و ناراحت نشده ام چون معتقدم:&lt;BR&gt;گاوان و خران باربردار&lt;BR&gt;به زآدمیان مردم آزار!&quot;&lt;BR&gt;رضا رفیع پرسید:&quot; حتما فیلم گاو آقای مهرجویی رادیده اید؟&quot; و چون پاکشیر قدری تامل کرد و بعد هم گفت یادش نیست، کاردان ازاو سوال کرد:&quot;اصلا تا حالا گاو دیده اید؟!&quot; و بعد داد سخن داد که:&quot;من همیشه دعا می کنم هرکس تا آخر عمرش زنده باشد ، البته به شرط سلامتی همه جوارح... همه جوارح گاو خوب است... تو هم هی سقلمه نزن رضا، برو زن بگیر!&quot;&lt;BR&gt;در این لحظه نشانی وبسایت رضا رفیع روی پرده نمایش داده شد و کاردان در تفسیر آن گفت:&quot;رفیع دات کام... کام یعنی بیا! (come) هرچه باشد دیگر ۳۸ سالش است! توی پروفایلش هم نوشته من تنها هستم!!&quot;&lt;BR&gt;&lt;BR&gt;آقای کاوه پیش از شعرخوانی به نکاتی اشاره کرد که طی جلسه به فراست دریافته بود:&quot; وقتی آقای کاردان به آقای رفیع گفت زن بگیر، رفیع جواب داد هرچه بخواهی، پیک بادپا برایت می آورد!... وقتی مهدی استاد احمد شعر مشترکش با نادر ختایی را خواند، نادر بیشتر ازهمه دست زد!...داشتم فکر می کردم این سه تکه چوب را برای چه به تریبون چسبانده اند و وقتی آقای پاکشیر گفت ۶۸ سالم است و زد به این چوب ها، دلیلش را فهمیدم!...&quot;&lt;BR&gt;کاردان گفت:&quot; آفرین... ۱۷ امتیاز!&quot;&lt;BR&gt;&lt;BR&gt;من و دوستم با موبایل هایمان، از زنی که با جدیت حین جلسه روزنامه خودش را می خواند و عروسکی که یک نفر روی دسته صندلی جلویی اش گذاشته بود عکس گرفتیم و در حال تبادل عکسها، با حجم بالای بلوتوث های روشن در سالن مواجه شدیم: میلاد، ویروس(!)، پوریا که سریع پیغامی هم فرستاد! و...!&lt;BR&gt;تا جلسه بعدی شکرخند، شما را به خیر و ما را به سلامت!&lt;/FONT&gt; 
&lt;P&gt;&lt;/P&gt;</description>
<pubDate>Wed, 12 Mar 2008 20:26:18 GMT</pubDate>
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<title>پیشرفت در اتوبوس!</title>
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<description>&lt;BR&gt;&lt;FONT face=&quot;Verdana, Arial, Helvetica, sans-serif&quot; size=4&gt;&lt;FONT color=#cc0066&gt;دیروز:&lt;BR&gt;نشسته به ایستاده - شما بفرمایید جای من بنشینید...&lt;BR&gt;&lt;BR&gt;امروز:&lt;BR&gt;همین به همان(!) ـ وسایلتان را بدهید من نگه دارم!&lt;BR&gt;&lt;BR&gt;و لابد فردا:&lt;BR&gt;همان به همان ـ شما بفرمایید من بنشینم!!&lt;BR&gt;&lt;BR&gt;&lt;BR&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;FONT color=#cc0066 size=3&gt;واما...&lt;BR&gt; شب شعرطنز شکرخند، به گفته مسوولانش، با تمام شدن ماه صفر، از سفر باز می گردد و چندمین(!) جلسه آن، دوشنبه ۲۰ اسفند ـ همین پس فردا - از ساعت ۴ تا ۷ بعدازظهر در فرهنگسرای ارسباران برگزار خواهد شد. اگر می توانید حتما بیایید، دور هم خوش می گذرد!&lt;BR&gt;گفتیم که بعدا نگویید نگفتی!&lt;/FONT&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;</description>
<pubDate>Sat, 08 Mar 2008 15:24:46 GMT</pubDate>
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<title>تبرج!</title>
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<description>&lt;BR&gt;&lt;FONT color=#990033&gt;- چکمه روی شلوار از مصادیق تبرج است.&lt;BR&gt;&lt;BR&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;FONT face=&quot;Verdana, Arial, Helvetica, sans-serif&quot; size=4&gt;&lt;FONT color=#990033&gt;کریسمس شد ولی بابا نوئل نیست&lt;BR&gt;اگر گفتی برای او چه رخ داد؟&lt;BR&gt;چو شلوارش درون چکمه اش بود&lt;BR&gt;بنابراین گرفتش گشت ارشاد!&lt;BR&gt;&lt;BR&gt;***&lt;BR&gt;ازاین پس از طبیعت هم بپرهیز&lt;BR&gt;نرو درآن به منظور تفرج&lt;BR&gt;که می باشند کوه و تپه و تل*&lt;BR&gt;همه ازپیشگامان تبرج!&lt;BR&gt;&lt;BR&gt;* &lt;/FONT&gt;&lt;FONT color=#990033&gt;&lt;FONT size=2&gt;البته منظور، تلخکی نیست ها!&lt;BR&gt;&lt;BR&gt;&lt;/FONT&gt;***&lt;BR&gt;برای گردش و سیر و سیاحت&lt;BR&gt;به دامان طبیعت رو نیارید&lt;BR&gt;ز&quot;دامن&quot;ها بپرهیزید اصولا&lt;BR&gt;مگرخود خواهر و مادر ندارید؟!&lt;BR&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/FONT&gt;</description>
<pubDate>Wed, 23 Jan 2008 13:52:00 GMT</pubDate>
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